उत्तरपुस्तिका पहुँची नहीं, फिर भी पूरा भुगतान: प्रो. पटेरिया पर सवाल, आयुक्त को कुलपति का प्रभार
रायपुर/रायगढ़। उच्च शिक्षा जगत में एक बार फिर विवाद गहराता नजर आ रहा है।रायगढ़ विश्वविद्यालय से जुड़े प्रो. पटेरिया पर वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोप लग रहे हैं। आरोप है कि पूरी उत्तरपुस्तिकाएँ विश्वविद्यालय तक पहुँची ही नहीं, इसके बावजूद संबंधित एजेंसी को करोड़ों रुपये का पूरा भुगतान कर दिया गया।
सूत्रों के अनुसार,रायगढ़ विवि में बीते दो महीनों में कई ऐसे वित्तीय निर्णय लिए गए, जिन पर सवाल खड़े हो रहे हैं।प्रदेश में प्रो पटेरिया पहले कुलपति हैं, जो आगामी 5 वर्ष के लिए उत्तरपुस्तिकाओं की खरीदी की।वहीं खासतौर पर उत्तरपुस्तिकाओं की खरीदी और भुगतान प्रक्रिया को लेकर नियमों की अनदेखी का आरोप है। सामान्यतः पूरा सामग्री विश्वविद्यालय को सौंपे जाने के बाद ही भुगतान किया जाता है, लेकिन इस मामले में बिना पूर्ण आपूर्ति के ही राशि जारी कर दी गई।जबकि विवि इसे नियमों के तहत बाद में भी कर सकता था,तो फिर इसमें हड़बड़ी क्यों कि गई।
प्रो. पटेरिया को लेकर यह भी चर्चा है कि वे हर राजनीतिक दौर में प्रभाव बनाए रखने में सफल रहे हैं। कांग्रेस सरकार के समय वे तत्कालीन उच्च शिक्षा मंत्री उमेश पटेल के बेहद करीबी माने जाते थे, वहीं वर्तमान भाजपा शासन में भी उनके संबंध सत्ता पक्ष के नेताओं से अच्छे बताए जाते हैं। यही कारण है कि “जीरो टॉलरेंस” की बात करने वाली सरकार ने अब तक इन आरोपों की औपचारिक जांच तक शुरू नहीं की।
इसी बीच, रायगढ़ स्थित शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय में कुलपति पद को लेकर भी स्थिति असामान्य बनी हुई है। नवनियुक्त कुलपति प्रो. विनय चौहान द्वारा तक पदभार ग्रहण नहीं किए जाने के कारण शासन ने बिलासपुर संभाग के आयुक्त को अस्थायी रूप से कुलपति का प्रभार सौंप दिया है।हालांकि यही काम प्रो पटेरिया के कार्यकाल समाप्ति 24 नवंबर 2025 को ही हो गया रहता, तो शिक्षा जगत में अच्छा संदेश जाता।
गौरतलब है कि प्रो. चौहान की नियुक्ति को लेकर भी शैक्षणिक और राजनीतिक हलकों में चर्चा है। अपेक्षाकृत कम उम्र महज 52 साल में कुलपति पद पर नियुक्ति को उनकी उपलब्धि माना जा रहा है, वहीं इसे लेकर कुछ वर्गों में असंतोष भी देखा जा रहा है।छत्तीसगढ़ में स्थानीय व बेहतर योग्यता वाले प्रोफेसरों की कोई कमी नहीं।बावजूद उन्हें लगातार अनदेखी की जा रही है।
राजनीतिक समीकरणों के बीच यह भी साफ है कि राज्य में मौजूदा सरकार का कार्यकाल लगभग ढाई वर्ष शेष है। ऐसे में नए कुलपति के लिए यह पूरा कार्यकाल आसान नहीं होगा। यदि सत्ता परिवर्तन होता है, तो उनके पद पर भी असर पड़ सकता है।प्रो चौहान विशुद्ध रूप से आरएसएस पृष्ठभूमि से आते हैं।ऐसे में आने वाले समय में विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली, नए कुलपति की भूमिका और इन वित्तीय आरोपों की दिशा क्या होगी—इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।



Beauro Cheif



